Tuesday, September 24, 2024

रस्सा-कशी

एक बार फिर से
ठेल दी गई आगे
सरकारी भर्ती परीक्षा की तारीख
जैसे ठेल दी जाती है
एक बच्चे की गेंद
जब वो हठ करने लगता है,

एक बार फिर दिखा दिया हुक्मरानों ने
कि तुम्हारी हाथों की लकीरें 
नहीं हैं तुम्हारे हाथ में
वे हमारे हाथों के रिमोट से चलती हैं 
और हम तुम्हारे भाग्य-विधाता हैं,

हमारे हर मिजाज़ को स्वीकार करना
तुम्हारा धर्म है
और तुम्हारे सपनों के गुब्बारों से खेलना
हमारा पसंदीदा मनोरंजन
हमारे खिलाफ जाने का खयाल भी
डाल सकता है तुम्हें भारी मुश्किल में,

ये सब सुन के जब मैं थर्रा उठा
और हाथ कांपने लगे
तब उन्हें एक ठोस स्पर्श ने थामा
और वे अचानक सशक्त हो गए,

मन की सारी दुर्बलता और भय
एक ज्वलंत आक्रोश में बदल गए
और अपनी कलम को मजबूती से थाम के 
मैं एक हठी बच्चा बन गया।


Wednesday, August 21, 2024

अधूरी ख्वाहिशें, थका सफर

एक बेचैन रात में ढूंढ रहा था
सुकून का वो लम्हा
जिसमें दिल की तमाम ख्वाहिशें
चैन की नींद सो पाएं
और अपने पूरे होने के ख्वाब को
थोड़े आराम से ढो पाएं।

ख्वाहिशों के इन ख्वाबों को
इतनी हिफाज़त से रखते हुए
मैंने लंबी सांस ली
जो कुछ अधूरी सी लगी
सांस के पूरी होने की राह में 
मेरी ख्वाहिशें थी खड़ी।
अपनी बेकाबू ख्वाहिशों के आगे
बेसहारा खड़ा होकर
सुकून के एक पल का मैं 
इंतज़ार करता रहा
हर गुजरता वक्त मुझ पर
वार करता रहा।

अंत में सिर टेक दिया
सारी ख्वाहिशों के आगे
मेरी थकी हुई आंखें 
उनसे नींद की भीख मांगे
पर वो निर्दयी सपने
और कठोर हो गए अपनी हठ में।

इस मुसाफिर को नसीब न अब कहीं आराम है,
इसके सपनों का मुकम्मल होना ही इसकी बेचैनी का विराम है।

Tuesday, June 25, 2024

दर्ज होने की चाहत

चाहते हैं हम सब
दर्ज हो जाना
किसी अखबार में टॉपर के रूप में
किसी बड़े ओहदे के रूप में
किसी शिलान्यास के पत्थर पर
या किसी बड़ी इमारत की तख्ती पर।

इस चाहत में अकसर नज़रंदाज़ हो जाते हैं
हम से रोज़ मिलते मुस्कुराते चेहरे
हमारी चाहत पूरी होने की प्रार्थना करने वाले
हमें सुनने वाले, समझने वाले
हम से प्यार करने वाले
और हमारा खयाल करने वाले लोग।

क्या इन सब के प्यार को
अपने भीतर दर्ज कर लेना
दर्जनों खबरों, ओहदों, पत्थरों
और तख्तियों से ज़्यादा कीमती नहीं है?


Friday, June 21, 2024

कहाँ तक सही है? (एक प्रयास)

खाना अच्छा बने तो कैच का मसाला ही इस्तेमाल हुआ
और खराब बने तो गोल्डी का,
कहाँ तक सही है भूल जाना उन हाथों को
जिनके न होने पर ये मसाले धरे के धरे रह जाते,
या फिर उन सभी बर्तनों को
जो अपना अहम योगदान कभी नहीं जताते,
या उन सभी अन्य मसालों को
जो गोल्डी और कैच की तरफदारी के बीच
ढूंढ रहे हैं अपना अस्तित्व।

कहाँ तक सही है
मसालों के दो खेमे बना लेना
और अपने खेमे को विजयी बनाने में जीवन लगा देना,
एक ही समाज से निकले 
सारे मसालों, बर्तनों और हाथों को
क्यों नहीं समझा जा सकता समाज का अभिन्न अंग?
कहाँ तक सही है 
मसालों की तरफदारी करने में
मूल्यों को भूल जाना।

Sunday, March 10, 2024

ख़याल

एक ख़याल आया 
पर लिखने से पहले चला गया
दूसरा ख़याल लिखा 
पर कागज़ पर उतार नहीं पाया
चाहा तीसरे ख़याल को बताना 
पर शब्दों ने गुस्ताखी कर दी
चौथे ख़याल को महफूज़ छोड़ दिया
दिल की गहराई में...

Sunday, February 18, 2024

तारीफ

चेहरे को दृढ़ कर
सुन रहा था मनमोहक स्वर,
पर खुशी से अस्थिर था दिल
इतनी तारीफें जो रहीं थी मिल।

फिर स्वयं से ये पूछा
मैं इनके हकदार हूँ क्या?
भीतर से आवाज़ आई
ये नहीं हैं तुम्हारे अकेले की कमाई।

माता-पिता और सारे दोस्त-यारों को
फिर मैंने धन्यवाद दिया
जीवन के हर मोड़ पर मिले अनमोल लोगों को
पूरे दिल से याद किया।

उसके उपरांत हाथ जोड़ और आँखें मूंद
की बस यही प्रार्थना
कि हे ईश्वर
कभी भी ये तारीफें
न जगायें मेरे भीतर का अहंकारी नर
सारे जीवन रहूँ सरल
और एक बेहतर मानव बनने को तत्पर।