खाना अच्छा बने तो कैच का मसाला ही इस्तेमाल हुआ
और खराब बने तो गोल्डी का,
कहाँ तक सही है भूल जाना उन हाथों को
जिनके न होने पर ये मसाले धरे के धरे रह जाते,
या फिर उन सभी बर्तनों को
जो अपना अहम योगदान कभी नहीं जताते,
या उन सभी अन्य मसालों को
जो गोल्डी और कैच की तरफदारी के बीच
ढूंढ रहे हैं अपना अस्तित्व।
कहाँ तक सही है
मसालों के दो खेमे बना लेना
और अपने खेमे को विजयी बनाने में जीवन लगा देना,
एक ही समाज से निकले
सारे मसालों, बर्तनों और हाथों को
क्यों नहीं समझा जा सकता समाज का अभिन्न अंग?
कहाँ तक सही है
मसालों की तरफदारी करने में
मूल्यों को भूल जाना।
Nice 👍👍
ReplyDelete