Friday, October 18, 2024

अगर...

अगर पर्याप्त बारिश हो जाती
तो बाढ़ या सूखा न पड़ता,
अगर मिट जाती गरीबी-बेरोजगारी
तो चारों ओर कितनी खुशहाली होती,
अगर न छीना जाता बचपन
तो हर बेटी राजकुमारी होती,
अगर मिल जाता चांद पर पानी
तो वहां भी रहने की संभावना होती,

इसी तरह समय का पहिया एक और चक्कर लगा लेता है
और हम सब रह जाते हैं 
अपने-अपने 'अगर' के साथ,

अगर सब कुछ मिल जाता और हो जाता,
तो कुछ भी मिलने और होने को नहीं बचता।

Tuesday, September 24, 2024

रस्सा-कशी

एक बार फिर से
ठेल दी गई आगे
सरकारी भर्ती परीक्षा की तारीख
जैसे ठेल दी जाती है
एक बच्चे की गेंद
जब वो हठ करने लगता है,

एक बार फिर दिखा दिया हुक्मरानों ने
कि तुम्हारी हाथों की लकीरें 
नहीं हैं तुम्हारे हाथ में
वे हमारे हाथों के रिमोट से चलती हैं 
और हम तुम्हारे भाग्य-विधाता हैं,

हमारे हर मिजाज़ को स्वीकार करना
तुम्हारा धर्म है
और तुम्हारे सपनों के गुब्बारों से खेलना
हमारा पसंदीदा मनोरंजन
हमारे खिलाफ जाने का खयाल भी
डाल सकता है तुम्हें भारी मुश्किल में,

ये सब सुन के जब मैं थर्रा उठा
और हाथ कांपने लगे
तब उन्हें एक ठोस स्पर्श ने थामा
और वे अचानक सशक्त हो गए,

मन की सारी दुर्बलता और भय
एक ज्वलंत आक्रोश में बदल गए
और अपनी कलम को मजबूती से थाम के 
मैं एक हठी बच्चा बन गया।


Wednesday, August 21, 2024

अधूरी ख्वाहिशें, थका सफर

एक बेचैन रात में ढूंढ रहा था
सुकून का वो लम्हा
जिसमें दिल की तमाम ख्वाहिशें
चैन की नींद सो पाएं
और अपने पूरे होने के ख्वाब को
थोड़े आराम से ढो पाएं।

ख्वाहिशों के इन ख्वाबों को
इतनी हिफाज़त से रखते हुए
मैंने लंबी सांस ली
जो कुछ अधूरी सी लगी
सांस के पूरी होने की राह में 
मेरी ख्वाहिशें थी खड़ी।
अपनी बेकाबू ख्वाहिशों के आगे
बेसहारा खड़ा होकर
सुकून के एक पल का मैं 
इंतज़ार करता रहा
हर गुजरता वक्त मुझ पर
वार करता रहा।

अंत में सिर टेक दिया
सारी ख्वाहिशों के आगे
मेरी थकी हुई आंखें 
उनसे नींद की भीख मांगे
पर वो निर्दयी सपने
और कठोर हो गए अपनी हठ में।

इस मुसाफिर को नसीब न अब कहीं आराम है,
इसके सपनों का मुकम्मल होना ही इसकी बेचैनी का विराम है।

Tuesday, June 25, 2024

दर्ज होने की चाहत

चाहते हैं हम सब
दर्ज हो जाना
किसी अखबार में टॉपर के रूप में
किसी बड़े ओहदे के रूप में
किसी शिलान्यास के पत्थर पर
या किसी बड़ी इमारत की तख्ती पर।

इस चाहत में अकसर नज़रंदाज़ हो जाते हैं
हम से रोज़ मिलते मुस्कुराते चेहरे
हमारी चाहत पूरी होने की प्रार्थना करने वाले
हमें सुनने वाले, समझने वाले
हम से प्यार करने वाले
और हमारा खयाल करने वाले लोग।

क्या इन सब के प्यार को
अपने भीतर दर्ज कर लेना
दर्जनों खबरों, ओहदों, पत्थरों
और तख्तियों से ज़्यादा कीमती नहीं है?


Friday, June 21, 2024

कहाँ तक सही है? (एक प्रयास)

खाना अच्छा बने तो कैच का मसाला ही इस्तेमाल हुआ
और खराब बने तो गोल्डी का,
कहाँ तक सही है भूल जाना उन हाथों को
जिनके न होने पर ये मसाले धरे के धरे रह जाते,
या फिर उन सभी बर्तनों को
जो अपना अहम योगदान कभी नहीं जताते,
या उन सभी अन्य मसालों को
जो गोल्डी और कैच की तरफदारी के बीच
ढूंढ रहे हैं अपना अस्तित्व।

कहाँ तक सही है
मसालों के दो खेमे बना लेना
और अपने खेमे को विजयी बनाने में जीवन लगा देना,
एक ही समाज से निकले 
सारे मसालों, बर्तनों और हाथों को
क्यों नहीं समझा जा सकता समाज का अभिन्न अंग?
कहाँ तक सही है 
मसालों की तरफदारी करने में
मूल्यों को भूल जाना।

Sunday, March 10, 2024

ख़याल

एक ख़याल आया 
पर लिखने से पहले चला गया
दूसरा ख़याल लिखा 
पर कागज़ पर उतार नहीं पाया
चाहा तीसरे ख़याल को बताना 
पर शब्दों ने गुस्ताखी कर दी
चौथे ख़याल को महफूज़ छोड़ दिया
दिल की गहराई में...

Sunday, February 18, 2024

तारीफ

चेहरे को दृढ़ कर
सुन रहा था मनमोहक स्वर,
पर खुशी से अस्थिर था दिल
इतनी तारीफें जो रहीं थी मिल।

फिर स्वयं से ये पूछा
मैं इनके हकदार हूँ क्या?
भीतर से आवाज़ आई
ये नहीं हैं तुम्हारे अकेले की कमाई।

माता-पिता और सारे दोस्त-यारों को
फिर मैंने धन्यवाद दिया
जीवन के हर मोड़ पर मिले अनमोल लोगों को
पूरे दिल से याद किया।

उसके उपरांत हाथ जोड़ और आँखें मूंद
की बस यही प्रार्थना
कि हे ईश्वर
कभी भी ये तारीफें
न जगायें मेरे भीतर का अहंकारी नर
सारे जीवन रहूँ सरल
और एक बेहतर मानव बनने को तत्पर।

Monday, February 12, 2024

विचारधारा

एक सच तुम्हारा है
एक सच मेरा है
हम दोनों के लिए हमारा सच 'ही' परम सत्य है...

इस 'ही' का आकार भले छोटा हो
पर यह प्रलय लाने में सक्षम है।

(J.N.U. कैंपस में हुई हिंसा से प्रेरित)

Tuesday, January 23, 2024

नौकरी

दी जाती थी जिसकी दबंगई की मिसाल
खड़ा था अपने हुज़ूर के सामने सारे शस्त्र डाल,
जो नहीं था किया उसकी डांट भी खानी थी
उसे बस अपनी नौकरी बचानी थी।

कुछ सपनों के लिए
कुछ अपनों के लिए
कुछ आने वाले खूबसूरत क्षणों के लिए 
वह काम करता चला गया।

Thursday, January 11, 2024

एक और प्रयास

नमस्कार🙏

एक लंबे अंतराल के बाद इस ब्लॉग पे कुछ पोस्ट हो रहा है। ऐसे में अंतराल होने का कारण और पोस्ट करने का उद्देश्य स्पष्ट कर देना उचित रहेगा। इस ब्लॉग की शुरुआत करने का उद्देश्य मात्र इतना था कि मैं अपने भावों को कविता के माध्यम से प्रकट कर लोगों तक पहुंचाना चाहता था। किंतु अब लगता है कि यह इतना आसान और मामूली उद्देश्य नहीं था जैसा उस समय लगा था। न केवल कुछ भाव लेकर उन्हें तुकबंदी के माध्यम से लोगों को समझा पाना महत्वाकांक्षी निर्णय था, बल्कि उन्हें कविता कहना बचकाना था।

कक्षा 11 में जब पहली कविता लिखी तो लोगों की सराहना और कोरोना के कहर से मिले अनिश्चित अवकाश को एक अवसर बनाने के प्रण के साथ इस ब्लॉग की शुरुआत की थी। अब जब वापस उस समय को देखता हूं तो ये लगता है कि यदि हवा में उमड़े भावों को तुकबंदी की तार में जकड़कर कुछ पंक्तियां लिखकर उन्हें 'कविता' की संज्ञा देने के बजाय यदि वास्तव में हिंदी साहित्य का अध्ययन किया होता तो एक अच्छा निर्णय होता। खैर, बीते हुए समय को अलग तरीके से जीने की कामना न केवल निरर्थक होती है, बल्कि कष्टकारी भी। इसलिए इस बात पर समय न व्यर्थ करते हुए आगे बढ़ जाना ठीक होगा।

आगे बढ़ने के क्रम में सबसे पहले इस ब्लॉग का नाम बदलने का निश्चय किया है। यह इसलिए नहीं कि देश में नाम बदलने का दौर चल रहा है, परंतु इसलिए क्योंकि मैं अपनी रचनाओं को कविता (Poetry) नहीं मानता। न मुझे इस स्तर पे साहित्य का उतना ज्ञान है और न मैं इतना सक्षम हूं की एक कविता की रचना कर सकूं। अगर मेरे द्वारा लिखी गई पंक्तियां कविता लगती हैं, या कोई प्रबुद्ध व्यक्ति उसे कविता की संज्ञा देता है, तो यह केवल एक संयोग है।

अब से इस ब्लॉग का नाम 'Hindi Poetries' से बदल कर 'मेरा आईना' होगा। मुझे यह लगता है कि जो लोग मेरी पंक्तियों की सराहना करते हैं वो मेरे स्वाभाविक कथन से प्रभावित होते हैं। इसलिए मैंने सोचा है कि इस ब्लॉग पर अपने भावों को स्वाभाविक रूप से व्यक्त्त करने का प्रयास करता रहूंगा।

अब मेरी यह इच्छा नहीं है कि मेरी लिखी गई पंक्तियां ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे और लोग उन्हें सराहें। इस ब्लॉग के माध्यम से ढेर सारे लोगों तक नहीं, बल्कि स्वयं के मन की गहराइयों तक पहुंचने की इच्छा है। यह ब्लॉग मेरा हिंदी के प्रति लगाव और प्यार बनाए रखने तथा इस भाषा में सहज रूप से स्वयं को व्यक्त करने का एक प्रयास है। मैं चाहता हूं कि अपनी प्रेषित की गई पंक्तियों को भविष्य में पढ़ूं तो एक सकारात्मक बदलाव का क्रम सामने आए। अंत में, मेरी यह कामना है कि यदि भूले-भटके कोई एक व्यक्ति भी मेरे द्वारा लिखी पंक्तियां पढ़े तो उसका समय व्यर्थ न हो। कम से कम उसका मनोरंजन तो हो ही। इन्हीं अंतहीन कामनाओं के साथ 'नौकरी' शीर्षक के अंतर्गत लिखी मेरी नवीन पंक्तियां अगले पोस्ट में साझा कर रहा हूं।

धन्यवाद!