कोयल आकर बैठी ,
कान तरस गए थे मेरे
उसका गाना सुनने को।
वह शुरू करे इससे पहले ही मैं पूछ उठा,
बता ये अजूबा हुआ कैसे?
धुँए,धूल,प्रदूषण, इत्यादि
की चोट से तुम बची कैसे?
उसने कहा कि आज मैं आज़ाद हूँ
खुलकर उड़ने को,
ये प्रकृति गुलज़ार है
क्योंकि तुम घरों में बंद हो।
ठप हो गई है तुम्हारी
मशीनों की दुनिया,
बंद हुए कृत्रिमता के कारखाने
तो खुल गई मेरी कड़ियाँँ।
जिस कोरोना से तुम भयभीत हो,
वो हमारे लिए करुणा का अवतार है,
तुम्हें अफनाहट है जिस कैद से,
वो हमारी साँसों की तार है।
हट गए गगन से
काले धब्बों के निशान,
नीले - स्वच्छ जल पर
दिख रहा है आसमान।
मेरी ही नहीं मेरे सभी दोस्तों की है यही प्रार्थना,
महामारी के बाद भी अपने वातावरण को स्वच्छ रखना।
ये हमारे ही नहीं तुम्हारे भी हित में,
देखो कहाँ पहुँचा दिया तुम्हें तुम्हारी ज़िद ने ?
उसका उत्तर सुनकर
भर आये नयन मेरे,
अपनी गलतियों की क्षमा हेतु
जुड़ गए हाथ मेरे ।
कर लिया मैंने अब
तुम भी प्रण कर लो,
अपनी सुंदर धरती को
हरियाली से भर दो।
-हार्दिक नारायण शुक्ला "यथार्थ"