Tuesday, January 23, 2024

नौकरी

दी जाती थी जिसकी दबंगई की मिसाल
खड़ा था अपने हुज़ूर के सामने सारे शस्त्र डाल,
जो नहीं था किया उसकी डांट भी खानी थी
उसे बस अपनी नौकरी बचानी थी।

कुछ सपनों के लिए
कुछ अपनों के लिए
कुछ आने वाले खूबसूरत क्षणों के लिए 
वह काम करता चला गया।

Thursday, January 11, 2024

एक और प्रयास

नमस्कार🙏

एक लंबे अंतराल के बाद इस ब्लॉग पे कुछ पोस्ट हो रहा है। ऐसे में अंतराल होने का कारण और पोस्ट करने का उद्देश्य स्पष्ट कर देना उचित रहेगा। इस ब्लॉग की शुरुआत करने का उद्देश्य मात्र इतना था कि मैं अपने भावों को कविता के माध्यम से प्रकट कर लोगों तक पहुंचाना चाहता था। किंतु अब लगता है कि यह इतना आसान और मामूली उद्देश्य नहीं था जैसा उस समय लगा था। न केवल कुछ भाव लेकर उन्हें तुकबंदी के माध्यम से लोगों को समझा पाना महत्वाकांक्षी निर्णय था, बल्कि उन्हें कविता कहना बचकाना था।

कक्षा 11 में जब पहली कविता लिखी तो लोगों की सराहना और कोरोना के कहर से मिले अनिश्चित अवकाश को एक अवसर बनाने के प्रण के साथ इस ब्लॉग की शुरुआत की थी। अब जब वापस उस समय को देखता हूं तो ये लगता है कि यदि हवा में उमड़े भावों को तुकबंदी की तार में जकड़कर कुछ पंक्तियां लिखकर उन्हें 'कविता' की संज्ञा देने के बजाय यदि वास्तव में हिंदी साहित्य का अध्ययन किया होता तो एक अच्छा निर्णय होता। खैर, बीते हुए समय को अलग तरीके से जीने की कामना न केवल निरर्थक होती है, बल्कि कष्टकारी भी। इसलिए इस बात पर समय न व्यर्थ करते हुए आगे बढ़ जाना ठीक होगा।

आगे बढ़ने के क्रम में सबसे पहले इस ब्लॉग का नाम बदलने का निश्चय किया है। यह इसलिए नहीं कि देश में नाम बदलने का दौर चल रहा है, परंतु इसलिए क्योंकि मैं अपनी रचनाओं को कविता (Poetry) नहीं मानता। न मुझे इस स्तर पे साहित्य का उतना ज्ञान है और न मैं इतना सक्षम हूं की एक कविता की रचना कर सकूं। अगर मेरे द्वारा लिखी गई पंक्तियां कविता लगती हैं, या कोई प्रबुद्ध व्यक्ति उसे कविता की संज्ञा देता है, तो यह केवल एक संयोग है।

अब से इस ब्लॉग का नाम 'Hindi Poetries' से बदल कर 'मेरा आईना' होगा। मुझे यह लगता है कि जो लोग मेरी पंक्तियों की सराहना करते हैं वो मेरे स्वाभाविक कथन से प्रभावित होते हैं। इसलिए मैंने सोचा है कि इस ब्लॉग पर अपने भावों को स्वाभाविक रूप से व्यक्त्त करने का प्रयास करता रहूंगा।

अब मेरी यह इच्छा नहीं है कि मेरी लिखी गई पंक्तियां ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे और लोग उन्हें सराहें। इस ब्लॉग के माध्यम से ढेर सारे लोगों तक नहीं, बल्कि स्वयं के मन की गहराइयों तक पहुंचने की इच्छा है। यह ब्लॉग मेरा हिंदी के प्रति लगाव और प्यार बनाए रखने तथा इस भाषा में सहज रूप से स्वयं को व्यक्त करने का एक प्रयास है। मैं चाहता हूं कि अपनी प्रेषित की गई पंक्तियों को भविष्य में पढ़ूं तो एक सकारात्मक बदलाव का क्रम सामने आए। अंत में, मेरी यह कामना है कि यदि भूले-भटके कोई एक व्यक्ति भी मेरे द्वारा लिखी पंक्तियां पढ़े तो उसका समय व्यर्थ न हो। कम से कम उसका मनोरंजन तो हो ही। इन्हीं अंतहीन कामनाओं के साथ 'नौकरी' शीर्षक के अंतर्गत लिखी मेरी नवीन पंक्तियां अगले पोस्ट में साझा कर रहा हूं।

धन्यवाद! 

Tuesday, March 24, 2020

प्रकृति जीवित हुई ✍️😌

बड़े दिनों के बाद मेरी खिड़की पर
कोयल आकर बैठी ,
कान तरस गए थे मेरे
उसका गाना सुनने को।

वह शुरू करे इससे पहले ही मैं पूछ उठा,
बता ये अजूबा हुआ कैसे?
धुँए,धूल,प्रदूषण, इत्यादि
की चोट से तुम बची कैसे?

उसने कहा कि आज मैं आज़ाद हूँ
खुलकर उड़ने को,
ये प्रकृति गुलज़ार है
क्योंकि तुम घरों में बंद हो।

ठप हो गई है तुम्हारी
मशीनों की दुनिया,
बंद हुए कृत्रिमता के कारखाने
तो खुल गई मेरी कड़ियाँँ।

जिस कोरोना से तुम भयभीत हो,
वो हमारे लिए करुणा का अवतार है,
तुम्हें अफनाहट है जिस कैद से,
वो हमारी साँसों की तार है।

हट गए गगन से
काले धब्बों के निशान,
नीले - स्वच्छ जल पर
दिख रहा है आसमान।

मेरी ही नहीं मेरे सभी दोस्तों की है यही प्रार्थना,
महामारी के बाद भी अपने वातावरण को स्वच्छ रखना।
ये हमारे ही नहीं तुम्हारे भी हित में,
देखो कहाँ पहुँचा दिया तुम्हें तुम्हारी ज़िद ने ?

उसका उत्तर सुनकर 
भर आये नयन मेरे,
अपनी गलतियों की क्षमा हेतु
जुड़ गए हाथ मेरे ।

कर लिया मैंने अब
तुम भी प्रण कर लो,
अपनी सुंदर धरती को 
हरियाली से भर दो।
                           -हार्दिक नारायण शुक्ला "यथार्थ"

Saturday, September 29, 2018

😭 होड़ में दबता बचपन 😵

आजकल नहीं है सुनने मिलता,
नन्हे-मुन्हों का शोर,
इसके लिए ज़िम्मेदार है,
आगे रहने की होड़।

किताबों की जंजीरों में जकड़कर,
इसने छीन लिया है बचपन,
खेल और प्रकृति से दूर कर,
सीमित कर दिया है जीवन।

न याद रहा घूमना,
न याद रहा खाना,
कलम-कागज़ गोंदते रहते,
कमरे को ही बना रखा ठिकाना।

गर्मियों की छुट्टियों में,
भूल जाते दोस्ती-यारी,
मौज-मस्ती को किनारे कर,
होतीं प्रतिस्पर्धाओं की तैयारी।

बस्ते का बढ़ता बोझ,
कर रहा मस्तिष्क पर घातक चोट,
व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में,
बच्चे बन रहे हैं रोबोट।

मैंने जितनी बार सोचा,
उतना ही शिक्षण व्यवस्था को कोसा,
बड़ा ही चिंताजनक है दृश्य,
बर्बाद हो रहा है देश का भविष्य।

रट-रटकर एक विद्यार्थी,
क्या जीवन में अव्व्वल आ पाएगा?
छात्र कक्षा में बस जानना चाहते,
परीक्षा में कौन-सा प्रश्न पूछा जाएगा?

हर छात्र है अलग-अलग,
चाहिए उन्हें भिन्न-भिन्न सेवा,
किन्तु विद्यालय के प्रांगण में,
मिलता उन्हें समान विषयों का मेवा।

विज्ञान,भूगोल,इतिहास, इत्यादि,
सब उनको है पढ़ना पड़ता,
किन्तु रुझान के अभाव में,
बुद्धि से सबकुछ है उड़ता।

मां-बाप और अध्यापक की डांट से,
तनावग्रस्त हो जाता उनका मन,
यदि शिक्षण प्रणाली रुढ़िवादी रही,
तो होड़ में दब जाएगा बचपन।

Friday, September 14, 2018

🙏 मैं लिख ना सका... ✍️

विषयों के भंवर में गुम था,
मन ने जब कविता की ख्वाहिश की,
भावों को लयबद्ध करने की कोशिश लिए,
हर विषय पर लिखने की आज़माइश की।

दुनिया को कलाकारों से भरा देख,
लगी लिखने की डगर आसान,
कागज़-कलम ले शूरू किया,
कठिनाइयों का न था अनुमान।

कभी कविता लिखी न थी,
बस था उसके बारे में सोचा,
फिर भी लिखने की कोशिश की,
था खुद पर भरोसा।

व्यस्त हो गए नयन,
सुंदर शब्दों को खोजने में लग गया मन,
जब भावों से पंक्तियां बन जातीं,
तब कर-कमलों की बारी आती।

जब अपने हृदय को टटोला,
सर्वप्रथम मां की छवि सामने आयी,
ममता की वह भोली मूरत,
थोड़ा इठलाई, थोड़ा शरमाई।

मां के बारे में यदि कहूं तो,
यह अतिशयोक्ति ही मानी जाएगी,
तिनके से भी छोटी चींटी,
हिमालय का वर्णन कैसे कर पाएगी।

बहुत संतोषी स्वभाव की है वो,
आता है उसे गमों को छुपाना,
बहुत मुश्किल पाया मैंने,
उसके व्यक्तित्व को चंद शब्दों में समेट पाना।

एक कविता न लिख पाने के आघात से अभी,
उबर न पाया था तभी,
पिताजी ने की प्रशंसा,
मैंने फिर चढ़ाई प्रत्यंचा।

मैंने तो सोचा इस बार,
विषय होगा भ्रष्टाचार,
इसने गिरा दिया व्यक्ति का ईमान,
बिना मिठाई न निकलता अब समस्या का समाधान।

भारत इसमें सबसे आगे,
भ्रष्टाचार की रेल यहां सरपट भागे,
वर्दी में बैठे लोग,
करते सर्वाधिक ऊपरी आय का भोग।

पर मैं था असहाय,
इसे दूर करने का न था कोई उपाय,
सब इसमें लिप्त, कोई न ठुकराए,
इसे खत्म करने की कोई  न दे पाए राय।

इसलिए मैंने इस विषय को छोड़ा,
अपने कवि मन को एक बार फिर तोड़ा।

अब मैं ठहर गया ज़रा,
अपने हृदय के हर पृष्ठ को पढ़ा,
बड़ी चिंता की थी बात,
खराब हुई थी शुरुआत।

प्रकृति की सुंदरता व प्राकृतिक आपदाएं,
ग़रीबी, बेरोजगारी एवं जघन्य घटनाएं,
सभी की ओर था झुकाव,
फिर भी न डाल पाया अपेक्षित प्रभाव।

चाहें हो जाऊं करोड़ों बार असफल,
ली है मैंने यह शपथ,
कभी लिखना नहीं छोडूंगा,
अपनी रुचि की ओर सभी का ध्यान मोडूंगा।