सुन रहा था मनमोहक स्वर,
पर खुशी से अस्थिर था दिल
इतनी तारीफें जो रहीं थी मिल।
फिर स्वयं से ये पूछा
मैं इनके हकदार हूँ क्या?
भीतर से आवाज़ आई
ये नहीं हैं तुम्हारे अकेले की कमाई।
माता-पिता और सारे दोस्त-यारों को
फिर मैंने धन्यवाद दिया
जीवन के हर मोड़ पर मिले अनमोल लोगों को
पूरे दिल से याद किया।
उसके उपरांत हाथ जोड़ और आँखें मूंद
की बस यही प्रार्थना
कि हे ईश्वर
कभी भी ये तारीफें
न जगायें मेरे भीतर का अहंकारी नर
सारे जीवन रहूँ सरल
और एक बेहतर मानव बनने को तत्पर।
Beautifully penned!
ReplyDeleteBeautiful <3
ReplyDelete