आजकल नहीं है सुनने मिलता,
नन्हे-मुन्हों का शोर,
इसके लिए ज़िम्मेदार है,
आगे रहने की होड़।
किताबों की जंजीरों में जकड़कर,
इसने छीन लिया है बचपन,
खेल और प्रकृति से दूर कर,
सीमित कर दिया है जीवन।
न याद रहा घूमना,
न याद रहा खाना,
कलम-कागज़ गोंदते रहते,
कमरे को ही बना रखा ठिकाना।
गर्मियों की छुट्टियों में,
भूल जाते दोस्ती-यारी,
मौज-मस्ती को किनारे कर,
होतीं प्रतिस्पर्धाओं की तैयारी।
बस्ते का बढ़ता बोझ,
कर रहा मस्तिष्क पर घातक चोट,
व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में,
बच्चे बन रहे हैं रोबोट।
मैंने जितनी बार सोचा,
उतना ही शिक्षण व्यवस्था को कोसा,
बड़ा ही चिंताजनक है दृश्य,
बर्बाद हो रहा है देश का भविष्य।
रट-रटकर एक विद्यार्थी,
क्या जीवन में अव्व्वल आ पाएगा?
छात्र कक्षा में बस जानना चाहते,
परीक्षा में कौन-सा प्रश्न पूछा जाएगा?
हर छात्र है अलग-अलग,
चाहिए उन्हें भिन्न-भिन्न सेवा,
किन्तु विद्यालय के प्रांगण में,
मिलता उन्हें समान विषयों का मेवा।
विज्ञान,भूगोल,इतिहास, इत्यादि,
सब उनको है पढ़ना पड़ता,
किन्तु रुझान के अभाव में,
बुद्धि से सबकुछ है उड़ता।
मां-बाप और अध्यापक की डांट से,
तनावग्रस्त हो जाता उनका मन,
यदि शिक्षण प्रणाली रुढ़िवादी रही,
तो होड़ में दब जाएगा बचपन।
Congrats beta .Keep doing.jai ho. Ma
ReplyDeleteKhub bhalo 😊👍
ReplyDeleteI am speechles and not have what to describe your talent 🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐🤐
ReplyDeleteBlog tmhra hai gud
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteKya baat hai
ReplyDeleteThanka everyone for encouraging me 😊😊😊
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