Namaste Friends, The posts here are from the core of my heart. This is a space where I'll vent out my thoughts, experiences and feelings on several issues I find common across India and the world. Some posts may also be personal (as the blog is not famous lol) If even one person can relate to my writings, it will be a great achievement. Thanks a lot for visiting:)
Tuesday, March 24, 2020
प्रकृति जीवित हुई ✍️😌
Saturday, September 29, 2018
😭 होड़ में दबता बचपन 😵
आजकल नहीं है सुनने मिलता,
नन्हे-मुन्हों का शोर,
इसके लिए ज़िम्मेदार है,
आगे रहने की होड़।
किताबों की जंजीरों में जकड़कर,
इसने छीन लिया है बचपन,
खेल और प्रकृति से दूर कर,
सीमित कर दिया है जीवन।
न याद रहा घूमना,
न याद रहा खाना,
कलम-कागज़ गोंदते रहते,
कमरे को ही बना रखा ठिकाना।
गर्मियों की छुट्टियों में,
भूल जाते दोस्ती-यारी,
मौज-मस्ती को किनारे कर,
होतीं प्रतिस्पर्धाओं की तैयारी।
बस्ते का बढ़ता बोझ,
कर रहा मस्तिष्क पर घातक चोट,
व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में,
बच्चे बन रहे हैं रोबोट।
मैंने जितनी बार सोचा,
उतना ही शिक्षण व्यवस्था को कोसा,
बड़ा ही चिंताजनक है दृश्य,
बर्बाद हो रहा है देश का भविष्य।
रट-रटकर एक विद्यार्थी,
क्या जीवन में अव्व्वल आ पाएगा?
छात्र कक्षा में बस जानना चाहते,
परीक्षा में कौन-सा प्रश्न पूछा जाएगा?
हर छात्र है अलग-अलग,
चाहिए उन्हें भिन्न-भिन्न सेवा,
किन्तु विद्यालय के प्रांगण में,
मिलता उन्हें समान विषयों का मेवा।
विज्ञान,भूगोल,इतिहास, इत्यादि,
सब उनको है पढ़ना पड़ता,
किन्तु रुझान के अभाव में,
बुद्धि से सबकुछ है उड़ता।
मां-बाप और अध्यापक की डांट से,
तनावग्रस्त हो जाता उनका मन,
यदि शिक्षण प्रणाली रुढ़िवादी रही,
तो होड़ में दब जाएगा बचपन।
Friday, September 14, 2018
🙏 मैं लिख ना सका... ✍️
विषयों के भंवर में गुम था,
मन ने जब कविता की ख्वाहिश की,
भावों को लयबद्ध करने की कोशिश लिए,
हर विषय पर लिखने की आज़माइश की।
दुनिया को कलाकारों से भरा देख,
लगी लिखने की डगर आसान,
कागज़-कलम ले शूरू किया,
कठिनाइयों का न था अनुमान।
कभी कविता लिखी न थी,
बस था उसके बारे में सोचा,
फिर भी लिखने की कोशिश की,
था खुद पर भरोसा।
व्यस्त हो गए नयन,
सुंदर शब्दों को खोजने में लग गया मन,
जब भावों से पंक्तियां बन जातीं,
तब कर-कमलों की बारी आती।
जब अपने हृदय को टटोला,
सर्वप्रथम मां की छवि सामने आयी,
ममता की वह भोली मूरत,
थोड़ा इठलाई, थोड़ा शरमाई।
मां के बारे में यदि कहूं तो,
यह अतिशयोक्ति ही मानी जाएगी,
तिनके से भी छोटी चींटी,
हिमालय का वर्णन कैसे कर पाएगी।
बहुत संतोषी स्वभाव की है वो,
आता है उसे गमों को छुपाना,
बहुत मुश्किल पाया मैंने,
उसके व्यक्तित्व को चंद शब्दों में समेट पाना।
एक कविता न लिख पाने के आघात से अभी,
उबर न पाया था तभी,
पिताजी ने की प्रशंसा,
मैंने फिर चढ़ाई प्रत्यंचा।
मैंने तो सोचा इस बार,
विषय होगा भ्रष्टाचार,
इसने गिरा दिया व्यक्ति का ईमान,
बिना मिठाई न निकलता अब समस्या का समाधान।
भारत इसमें सबसे आगे,
भ्रष्टाचार की रेल यहां सरपट भागे,
वर्दी में बैठे लोग,
करते सर्वाधिक ऊपरी आय का भोग।
पर मैं था असहाय,
इसे दूर करने का न था कोई उपाय,
सब इसमें लिप्त, कोई न ठुकराए,
इसे खत्म करने की कोई न दे पाए राय।
इसलिए मैंने इस विषय को छोड़ा,
अपने कवि मन को एक बार फिर तोड़ा।
अब मैं ठहर गया ज़रा,
अपने हृदय के हर पृष्ठ को पढ़ा,
बड़ी चिंता की थी बात,
खराब हुई थी शुरुआत।
प्रकृति की सुंदरता व प्राकृतिक आपदाएं,
ग़रीबी, बेरोजगारी एवं जघन्य घटनाएं,
सभी की ओर था झुकाव,
फिर भी न डाल पाया अपेक्षित प्रभाव।
चाहें हो जाऊं करोड़ों बार असफल,
ली है मैंने यह शपथ,
कभी लिखना नहीं छोडूंगा,
अपनी रुचि की ओर सभी का ध्यान मोडूंगा।