Wednesday, August 21, 2024

अधूरी ख्वाहिशें, थका सफर

एक बेचैन रात में ढूंढ रहा था
सुकून का वो लम्हा
जिसमें दिल की तमाम ख्वाहिशें
चैन की नींद सो पाएं
और अपने पूरे होने के ख्वाब को
थोड़े आराम से ढो पाएं।

ख्वाहिशों के इन ख्वाबों को
इतनी हिफाज़त से रखते हुए
मैंने लंबी सांस ली
जो कुछ अधूरी सी लगी
सांस के पूरी होने की राह में 
मेरी ख्वाहिशें थी खड़ी।
अपनी बेकाबू ख्वाहिशों के आगे
बेसहारा खड़ा होकर
सुकून के एक पल का मैं 
इंतज़ार करता रहा
हर गुजरता वक्त मुझ पर
वार करता रहा।

अंत में सिर टेक दिया
सारी ख्वाहिशों के आगे
मेरी थकी हुई आंखें 
उनसे नींद की भीख मांगे
पर वो निर्दयी सपने
और कठोर हो गए अपनी हठ में।

इस मुसाफिर को नसीब न अब कहीं आराम है,
इसके सपनों का मुकम्मल होना ही इसकी बेचैनी का विराम है।

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